भिलाई/छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य मंत्री बदरुद्दीन कुरैशी ने, 4 नवंबर को महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, प्रख्यात उद्योगपति, समाज सुधारक एवं गांधीवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक सेठ जमनालाल बजाज की जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन l जमनालाल बजाज का संपूर्ण जीवन देशसेवा, त्याग, समाज सुधार और मानव कल्याण के लिए समर्पित रहा। उनका जन्म 4 नवंबर 1889 को राजस्थान के सीकर जिले के काशी का बास गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम कनीराम और माता का नाम बिरदीबाई था। मात्र पांच वर्ष की आयु में सेठ बच्छराज बजाज ने उन्हें गोद ले लिया था। जमनालाल बजाज,महात्मा गांधी के बेहद करीबी सहयोगी थे। गांधीजी उन्हें अपने पांचवें पुत्र के समान मानते थे। उन्होंने देश की आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन में भाग लेते हुए अंग्रेजों द्वारा दी गई ‘राय बहादुर’ की उपाधि त्याग दी थी। जमनालाल बजाज ने वर्ष 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह, 1930 में नमक सत्याग्रह तथा 1939 में जयपुर सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले महान समाज सुधारक भी थे। उन्होंने खादी, ग्रामोद्योग, महिला शिक्षा, दलित उत्थान, गोसेवा और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। वर्ष 1928 में उन्होंने वर्धा स्थित अपने पारिवारिक लक्ष्मीनारायण मंदिर के द्वार सभी वर्गों के लोगों के लिए खोल दिए थे। उन्होंने वर्ष 1926 में बजाज उद्योग समूह की नींव रखी। 11 फरवरी 1942 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार और आदर्श आज भी समाज को प्रेरणा देते हैं। जमनालाल बजाज का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता धन-दौलत में नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण में होती है। ऐसे महान देशभक्त एवं समाजसेवी को उनकी जयंती पर शत-शत नमन।
