भिलाई/छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्यमंत्री बदरुद्दीन कुरैशी ने, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी विचारक, प्रखर राष्ट्रवादी नेता एवं स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख स्तंभ विपिन चंद्र पाल जी की जयंती तथा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक और अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन l इन दोनों महान विभूतियों का भारतीय इतिहास में अतुलनीय योगदान रहा है। विपिन चंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर 1858 को तत्कालीन बंगाल के सिलहट क्षेत्र में हुआ था। वे बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय के साथ प्रसिद्ध लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति के प्रमुख सदस्य थे। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और आत्मनिर्भरता के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एक निर्भीक पत्रकार, प्रभावशाली वक्ता और महान राष्ट्रवादी चिंतक थे। उनके विचारों और संघर्ष ने देशवासियों में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध जागरूकता, आत्मसम्मान और आजादी की भावना को मजबूत किया। उनका संपूर्ण जीवन देश की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना को समर्पित रहा। भारतीय इतिहास के ऐसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध उठी क्रांति को नेतृत्व और एकता का प्रतीक प्रदान किया। वे भारत के अंतिम मुगल सम्राट होने के साथ-साथ एक संवेदनशील शायर भी थे। 1857 के विद्रोह में विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों के क्रांतिकारियों ने उन्हें अपना प्रतीकात्मक नेतृत्व स्वीकार किया था। अंग्रेजों ने विद्रोह को कुचलने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर रंगून (वर्तमान यांगून, म्यांमार) निर्वासित कर दिया, जहां 7 नवंबर 1862 को उनका निधन हुआ। अपने देश से दूर निर्वासन में अंतिम सांस लेने वाले बहादुर शाह ज़फ़र का जीवन स्वतंत्रता, स्वाभिमान और देशप्रेम की पीड़ादायक गाथा है। श्री कुरैशी ने कहा कि विपिन चंद्र पाल जैसे राष्ट्रवादी विचारकों और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक प्रतीकों का त्याग, संघर्ष और योगदान आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा। हमें उनके आदर्शों को आत्मसात करते हुए देश की एकता, अखंडता और भाईचारे को मजबूत बनाने का संकल्प लेना चाहिए।
