भिलाई/छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य मंत्री बदरुद्दीन कुरैशी ने, महान साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं महान राष्ट्रवादी श्यामजी कृष्ण वर्मा की जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना गांव में सन् 1884 में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के महान आलोचक, निबंधकार, साहित्य- इतिहासकार एवं चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनकी कालजयी कृति ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ ने हिंदी साहित्य के इतिहास और आलोचना को व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान की। ‘चिंतामणि’, ‘रसमीमांसा’ सहित उनके साहित्यिक योगदान ने हिंदी आलोचना को नई ऊंचाई दी और आज भी उनका चिंतन साहित्य जगत के लिए प्रेरणास्रोत है। श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात के कच्छ के मांडवी में हुआ था। वे विद्वान, राष्ट्रवादी विचारक, वकील और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रखर समर्थक थे। संस्कृत के गहन अध्येता रहे श्यामजी कृष्ण वर्मा ने विदेश में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए निरंतर संघर्ष किया। उन्होंने ‘इंडियन होम रूल सोसाइटी’ की स्थापना की तथा लंदन में ‘इंडिया हाउस’ स्थापित कर भारतीय विद्यार्थियों और स्वतंत्रता समर्थक युवाओं को एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया। ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। उनका जीवन देशभक्ति, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी लेखनी से हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध किया, वहीं श्यामजी कृष्ण वर्मा ने अपने राष्ट्रवादी विचारों और सक्रिय प्रयासों से स्वतंत्रता की चेतना को विदेशों तक पहुंचाया। दोनों महान विभूतियों का जीवन हमें ज्ञान, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक चेतना और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है। उनकी जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों और आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेने का दिन है। इन दोनों महान विभूतियों को जयंती पर शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।
